बुढ़ापा
बुढ़ापा में पेन और चश्मा ,
मुझको गजब छकाता ।
ढूंढ ढूंढ होता परेशान ,
फिर भी समझ ना आता ।
नाती मेरा करता गड़बड़ ,
नाती को चमकाया ।
क्यों करते चश्मा को गड़बड़
अब तक समझ ना आया ।
नाती बोला दादा जी ,
फोकट में दोष लगाते हो ।
आंख में चश्मा लगा रखी है ,
फिर भी क्यों चमकाते हो ।
छू कर देखा चश्मा को ,
फिर आया सांस में सांस ।
जाने की बड़ी जल्दी थी ,
फिर झल्लाहट थी खास।
हास्य कवि/लेखक
गजानंद साहू
तिल्दा असौंदा
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