मंगलवार, 13 अगस्त 2019

चाँद छत से उतर गया होता

चाँद छत से उतर गया होता।
फिर मैं घुट-घुट के मर गया होता॥

मैं अगर चाँद पर गया होता।
गर्व उसका उतर गया होता॥

भूल जाता परिंदा उड़ना, अगर।
उनकी छत पर उतर गया होता॥

राह में खुश्बुए नहीं मिलती।
मैं अगर सीधा घर गया होता॥

मुझको आवाज़ गर वो दे देते।
क्यों इधर या उधर गया होता॥

मैं भी चलता उठा के सिर अपना।
सच से थोड़ा मुकर गया होता॥

मैं अदालत में सच अगर कहता।
शर्तिया मेरा सर गया होता॥

ऑन कर देते प्रेम का स्विच अगर।
नूर लव का बिखर गया होता॥

अनिल श्रीवास्तव 'ज़ाहिद'

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें