"छत्तीसगढ़ी कविता"
🌹का बतावं मन के हाल🌹
का बतावं मन के हाल ला दीदी,
ना गांव मा घर ना खार मा
खेती।
चुरा हवय मन बिन तेल कस,
बाती,
भीतरी भीतर घुघुंवावथ हवय ,
छाती।
मुड़ी ला तोपंव ता उघरतहवय,
एड़ी।
का बतावं मन के हाल ला
दीदी।
संसो के रात पहावत नई,
हे।
छप्पन भोग घोलक मिठावत,
नई हे।
सुकुवा पहा गे फेर भितिया,
अंधियारी।
का बतावं मन के हाल ला
दीदी।
ससुरे अऊ मइके केमानेमा.
चुरगैव।
केंवरी कांधा मा जुड़ा ला,
धर लेवं।
फंदाय बैईला कस घुमत,
तेलघानी।
का बतावं मन के हाल ला,
दीदी।
सांप छछुंधर कस गति हवय
भारी।
उगलो तौ अंधरी लीलव तौ,
मरनी।
बुढ़त हवय दतला फेर दुनिया बर हांसी।
का बतावं मन के हाल ला,
दीदी।
ना गांव मा घर ना खार मा.
खेती।
"ईति"
।।।।।प्रमदा ठाकुर।।।।।
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