छत्तीसगढ़िया
छत्तीसगढ़ के छत्तीस गोठ ,
छत्तीसगढ़िया रहिथे पोठ ।
खाथे भले ये चटनी बासी ,
बड़ मजबूत हे एकर काठी ।
बड़ सिधवा हे मोर मितान ,
पर फूसकारही त डोमी जान ।
लागबे झन तैं एकर संग ,
नई ते जिनगी मा पड़ जहि भंग ।
अइसन हे छत्तीसगढ़ वासी ,
दया मया के हावय प्यासी ।
झन छेंड़व छत्तीसगढ़िया ला ,
शांत सुभाव सरल बढ़िया ला ।
जेन दिन ये भन्ना जाहि ,
सुनय नहीं सन्ना जाहि ।
भागे के बतर नहीं मिलही ,
भुरवा डोमी जइसे दिखही ।
शांत रही तब पिटपीटी ,
जेन रहिथे सीधा साधा ।
बदल जही तब डोमी बनके ,
कर दीही आधा आधा ।
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
कविता के सबो संगवारी मन ला
बिहनिया बेरा के जय जोहार
गजानंद साहू तिल्दा (असौंदा)
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