हाइकु
1
कटा बिरवा-
बिलख रहे बच्चे
माँ से लिपट
2
कुएँ की खोल
घोसले पास जगा
पीपल पेड़
3
आद्र मौसम-
डंक से कराहता
मूक बालक
स्वरचित
माधुरी डड़सेना
हाइकु
1
कटा बिरवा-
बिलख रहे बच्चे
माँ से लिपट
2
कुएँ की खोल
घोसले पास जगा
पीपल पेड़
3
आद्र मौसम-
डंक से कराहता
मूक बालक
स्वरचित
माधुरी डड़सेना
हाइकु
१.गिरते पत्ते,
जमीन पे बिखरे
ओस की बूंदे।
२.नाचते मोर,
काले बादल देख
धरा हर्षायी।
३.दिल खिलेंगे,
साथी बचपन के
फिर मिलेंगे।
तोषण धनगंइहा
९६१७५८९६६७
बुढ़ापा
बुढ़ापा में पेन और चश्मा ,
मुझको गजब छकाता ।
ढूंढ ढूंढ होता परेशान ,
फिर भी समझ ना आता ।
नाती मेरा करता गड़बड़ ,
नाती को चमकाया ।
क्यों करते चश्मा को गड़बड़
अब तक समझ ना आया ।
नाती बोला दादा जी ,
फोकट में दोष लगाते हो ।
आंख में चश्मा लगा रखी है ,
फिर भी क्यों चमकाते हो ।
छू कर देखा चश्मा को ,
फिर आया सांस में सांस ।
जाने की बड़ी जल्दी थी ,
फिर झल्लाहट थी खास।
हास्य कवि/लेखक
गजानंद साहू
तिल्दा असौंदा