बस तू ही तू है
ये कैसा जादू है
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बेबसों पे जुल्म
ये कैसा बाजू है
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लफ्ज हो पर्दे मे रहो
बंदिशें लागू है
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मत कलम समझना
नश्तर है चाकू है
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हर जुबां हो संग मेरे
अजब आरजू है
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बाँटता है मजहब
ये कैसा साधू है
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सपने सब तेरे मेरे
जल रहे धू-धू है
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कर्ज बोझ भावों का
भुगतता नंदू है
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नंदराम यादव निशांत मुँगेली
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मंगलवार, 13 अगस्त 2019
बस तू ही तू
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